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‘कैश इज किंग’—मध्य पूर्व संकट में क्यों टूटे शेयर, सोना और बॉन्ड, और डॉलर बना सबसे बड़ा ठिकाना

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पश्चिम एशिया में भड़कते तनाव ने वैश्विक बाजारों की दिशा ही बदल दी है। इजरायल-लेबनान टकराव और ईरान से जुड़ी आशंकाओं ने ऊर्जा आपूर्ति की धमनियों—खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज जलडमरूमध्य—पर जोखिम बढ़ा दिया है। नतीजा यह कि निवेशकों ने पारंपरिक सुरक्षित ठिकानों पर भरोसा घटाकर सीधे नकदी और डॉलर का रुख कर लिया। बुधवार की सुबह भारतीय बाजारों में भी वही घबराहट दिखी—Nifty 50 करीब 2% टूटकर 24,300 के आसपास और BSE Sensex लगभग 1,700 अंकों की गिरावट के साथ 78,500 के करीब फिसल गया। जोखिम का पैमाना माने जाने वाला India VIX तेज उछाल के साथ 14% तक पहुंचा, जो बाजार में फैली बेचैनी का संकेत है।
इस बार बेचैनी की कहानी अलग है। सामान्य तौर पर संकट में शेयर बिकते हैं, सोना और सरकारी बॉन्ड चमकते हैं। मगर अभी तीनों पर दबाव है। वजह—पोर्टफोलियो में एक साथ “वैल्यू-एट-रिस्क” शॉक। जब कई एसेट क्लास में तेजी से गिरावट आती है, तो फंड मैनेजरों को मार्जिन कॉल चुकाने और जोखिम घटाने के लिए अच्छी संपत्तियां भी बेचनी पड़ती हैं। इसी मजबूरी में सोने में मुनाफावसूली दिखी, जबकि अमेरिकी बॉन्ड यील्ड चढ़ गईं—दो वर्षीय ट्रेजरी यील्ड लगभग 3.6% तक पहुंची, जो हाल के महीनों का ऊंचा स्तर है।
ऊर्जा बाजार ने आग में घी डाला। वैश्विक बेंचमार्क Brent Crude में जोरदार उछाल आया और यह 7% तक चढ़ गया। महंगा तेल महंगाई और विकास—दोनों पर दबाव बनाता है। भारत जैसे देश, जो अपनी लगभग 85% तेल जरूरत आयात से पूरा करते हैं, उनके लिए यह दोहरी मार है: बढ़ता आयात बिल और कमजोर होता रुपया। उधर डॉलर की मजबूती ने पूंजी को और खींचा; डॉलर की चाल को मापने वाला US Dollar Index ऊंचे स्तर पर बना रहा, जिससे उभरते बाजारों पर अतिरिक्त दबाव आया।
अमेरिका में भी असर साफ रहा। S&P 500 दो महीने के निचले स्तर के करीब फिसला, जो वैश्विक जोखिम-घटाने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। दिलचस्प यह कि “क्वालिटी की ओर उड़ान” अब लंबी अवधि के बॉन्ड या सोने तक सीमित नहीं; बड़ी मात्रा में पैसा सीधे शॉर्ट-टर्म कैश इंस्ट्रूमेंट्स में जा रहा है। LSEG लिपर के आंकड़ों के मुताबिक, हाल के दिनों में ग्लोबल मनी मार्केट फंड्स में अरबों डॉलर का शुद्ध निवेश हुआ, जबकि इक्विटी फंड्स से निकासी दर्ज की गई। यह बताता है कि निवेशक फिलहाल “रिटर्न” नहीं, “रिटर्न ऑफ कैपिटल” यानी पूंजी की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारतीय संदर्भ में चुनौती बहुआयामी है। तेल के दाम ऊंचे रहने पर चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है, रुपया दबाव में आ सकता है और इनपुट लागत बढ़ने से कॉर्पोरेट मार्जिन सिकुड़ सकते हैं। बैंकिंग और ऑटो जैसे चक्रीय सेक्टर झटके के प्रति संवेदनशील हैं, जबकि फार्मा और कुछ रक्षा कंपनियां तुलनात्मक रूप से स्थिर मांग के कारण बेहतर टिकाव दिखा सकती हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि यदि तनाव 3–4 सप्ताह में थमता है तो बाजारों में तेज रिकवरी संभव है; लेकिन खिंचाव लंबा हुआ तो उतार-चढ़ाव ऊंचा रह सकता है।
आगे का रास्ता क्या? फिलहाल बाजार “शॉक मोड” में है। महंगे तेल और युद्ध की अनिश्चितता ने अस्थिरता बढ़ा दी है। हालांकि कुछ विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि डॉलर की यह दौड़ अनंत नहीं—इतिहास बताता है कि युद्ध शुरुआती डर से शुरू होकर लंबी थकान में बदलते हैं, जो अंततः डॉलर के लिए नकारात्मक भी हो सकता है। निवेशकों के लिए संदेश साफ है: घबराहट में पूरे पोर्टफोलियो को खाली करने के बजाय जोखिम प्रोफाइल के मुताबिक संतुलन बनाएं, पर्याप्त नकदी रखें और गुणवत्ता वाले शेयरों में चरणबद्ध निवेश पर विचार करें। जब तक मध्य पूर्व के बादल नहीं छंटते, बाजारों में तेज उतार-चढ़ाव सामान्य रहेगा—और इसी उथल-पुथल में अवसर भी छिपे होंगे।

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